2nd PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Gaurav Chapter 10 सूरदास के पद

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Karnataka 2nd PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Gaurav Chapter 10 सूरदास के पद

सूरदास के पद Questions and Answers, Notes, Summary

I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
अपने आपको कौन भाग्यशालिनी समझ रही हैं?
उत्तर:
अपने आपको गोपिकाएँ भाग्यशालिनी समझ रही हैं।

प्रश्न 2.
गोपिकाएँ किसे संबोधित करते हुए बातें कर रही हैं?
उत्तर:
गोपिकाएँ उद्धव को संबोधित करते हुए बातें कर रही हैं।

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प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण के कान में किस आकार का कुंडल है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण के कान में मकर के आकार का कुंडल है।

प्रश्न 4.
वाणी कहाँ रह गई?
उत्तर:
वाणी मुखद्वार तक आकर रुक गई।

प्रश्न 5.
कौन अंतर की बात जानने वाले हैं?
उत्तर:
सूरदास के प्रभु कृष्ण अंतर की बात जानने वाले हैं।

प्रश्न 6.
श्रीकृष्ण के अनुसार किसने सब माखन खा लिया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण के अनुया नान सखा ने सब माखन खा लिया हैं।

प्रश्न 7.
सूरदास किसकी शोभा पर बलि जाते हैं?
उत्तर:
सूरदास कृष्ण और गोपी की शोभा पर बलि जाते हैं।

अतिरिक्त प्रश्न :

प्रश्न 1.
गोपिकाओं को किनकी आँखों से लगाव है?
उत्तर:
गोपिकाओं को ऊधौ की आँखों से लगाव है।

प्रश्न 2.
सुमन से खुशबू कौन लेकर आता है?
उत्तर:
सुमन से पवन खुशबू लेकर आता है।

प्रश्न 3.
मधुप के मन में किसके प्रति अनुराग पैदा हुआ?
उत्तर:
मधुप के मन में सुमन के प्रति अनुराग पैदा हुआ।

प्रश्न 4.
अंग-अंग में किसका संचार हुआ?
उत्तर:
अंग-अंग में आनंद का संचार हुआ।

प्रश्न 5.
विरह-व्यथा किनकी दूर हुई?
उत्तर:
गोपिकाओं की विरह-व्यथा दूर हुई।

प्रश्न 6.
नंद-नंदन कहाँ पर देखे गये?
उत्तर:
नंद-नंदन यमुना तट पर देखे गये।

प्रश्न 7.
श्रीकृष्ण ने कौन-से रंग का वस्त्र धारण किया हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने पीले रंग के वस्त्र धारण किये हैं।

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प्रश्न 8.
श्रीकृष्ण के तन से किसकी खुशबू आ रही हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण के तन से चंदन की खुशबू आ रही हैं।

प्रश्न 9.
श्रीकृष्ण के प्रेम में कौन मग्न हो जाती हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण के प्रेम में गोपिकाएँ मग्न हो जाती हैं।

प्रश्न 10.
श्रीकृष्ण की आँखें कैसी हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की आँखें कमलनयन के समान हैं।

प्रश्न 11.
श्रीकृष्ण से सकुचाते हुए कौन मिलती हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण से ब्रजनारियाँ सकुचाते हुए मिलती हैं।

प्रश्न 12.
कान्हा क्या करते हुए पकड़े गये?
उत्तर:
कान्हा माखन चोरी करते हुए पकड़े गये।

प्रश्न 13.
कान्हा ने कब-कब ग्वालिनी को सताया?
उत्तर:
कान्हा ने निसि-बासर (रात-दिन) ग्वालिनो को सताया।

प्रश्न 14.
ग्वालिनी का क्रोध जब शांत हो जाता है तब वह क्या करती है?
उत्तर:
ग्वालिनी का क्रोध जब शांत हो जाता है तब वह कृष्ण को हृदय से लगा लेती है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
गोपिकाएँ अपने आपको क्यों भाग्यशालिनी समझती हैं?
उत्तर:
गोपिकाएँ अपने आपको भाग्यशालिनी समझती हैं क्योंकि जिन आँखों से उद्धव ने श्रीकृष्ण को देखा था, वे आँखें अब उन्हें मिल गई हैं अर्थात् गोपिकाएँ उद्धव के आँखों में श्याम की आँखें, श्याम की मूरत देख रहें हैं। जैसे भोरें के प्रिय सुमन की सुगंध को हवा ले आती है वैसे ही उद्धव को देखकर उन्हें अत्यधिक आनन्द हो रहा है तथा उनके अंग-अंग सुख में रंग गया है। जैसे दर्पण में अपना रूप देखने से दृष्टि अति रुचिकर लगने लगती है, उसी प्रकार उद्धव के नेत्र रूपी दर्पण में कृष्ण के नेत्रों के दर्शन कर गोपिकाओं को बहुत अच्छा लग रहा है और अपने आपको भाग्यशालीनी समझती हैं।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण के रूप सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सूरदास भगवान श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं- गोपिकाओं ने यमुना नदी तट पर श्रीकृष्ण को देख लिया। वे मोर मुकुट पहने हुए हैं। कानों में मकराकृत कुण्डल धारण किये हुए हैं। पीले रंग के रेशमी वस्त्र पहने हुए हैं। उनके तन पर चन्दन-लेप है। वे अत्यंत शोभायमान हैं। उनके दर्शन मात्र से गोपिकाएँ तृप्त हुईं। हृदय की तपन बुझ गई। वे सुन्दरियाँ प्रेम-मग्न हो गईं। उनका हृदय भर आया। सूरदास कहते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण अन्तर्यामी हैं और गोपिकाओं के व्रत को पूरा करने के लिए ही पधारे हैं।

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प्रश्न 3.
सूरदास ने माखन चोरी प्रसंग का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
सूरदास गोपिकाओं के समर्पण भाव के बारे में बता रहे है। इसमें हमे यशोदा और ग्वालिनी के वात्सल्य प्रेम के बारे में जान सकते है। चोरी करते हुए कान्हा पकडे गए गोपियाँ कहती है – कान्हा तुम तो दिन-रात हमे सताते हो, आज जाके तुम हमारे हाथ आए हो। जितना भी माखन-दही हो सब खा लेते हो। अब तुम्हारा यह खेल खत्म हुआ। मै तुम्हे भलीभाँति जानती हूँ। तुम्हीं माखन चोर हो। कान्हा के हाथ पकडकर, ‘माखन जितना चाहे माँग के खाते’ कहने पर बड़े ही निरागसता से कान्हा कहते है – ‘तुम्हारी सौगंध, माखन मैनें नहीं खाया मेरे सारे दोस्त ही खा लेते है और मेरा नाम बताते है।’ उसके मुखपर लगा माखन देखा और उसकी प्यारी, तुतलाती बोलों को सुनकर गोपिका के हृदय ममता से भर उठता है। कान्हा का यह रूप उसे इतना लुभावना लगता है कि उसका गुस्सा भाग जाता है और वह कान्हा को गोदी में उठा लेती है। यह दृश्य देखकर सूरदास कहते है ऐसे कान्हा और गोपिका पर तो मैं बलि बलि जाऊँ।

III. ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :

प्रश्न 1.
ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी।
जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं।
जैसे समन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी।
अति आनंद होत है तैसैं, अंग-अंग सुख रागी।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘सूरदास के पद’ से लिया गया है, जिसके रचयिता सूरदास जी हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत पद में गोपियाँ उद्धव को संबोधित करती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! आज हम स्वयं को बहुत भाग्यशाली मान रहे हैं क्योंकि जो आँखे हमारे प्यारे कृष्ण के दर्शन करके आयीं हैं उन्हीं आँखों के दर्शन हमें मिल गए हैं।

भाव स्पष्टीकरण : सूरदास ने भ्रमर गीत में ब्रज की गोपिकाओं की विरह-व्यथा का बहुत ही मार्मिक ढंग से वर्णन किया है। श्रीकृष्ण कंस को मारने मथुरा गए लेकिन बहुत दिनों तक वापस ब्रज नहीं आये। यहाँ श्रीकृष्ण के बिना गोपिकाएँ बहुत ही उदास थीं। वे कृष्ण की राह देखती थीं। श्रीकृष्ण अपने सखा उद्धव को ब्रज के बारे में जानने के लिए भेजते हैं। उद्धव से गोपिकाएँ कहती हैं – ‘आज हम बहुत ही भाग्यशालिनी बन गईं। जिन आँखों से तुमने श्याम को देखा उन आँखों को देखने का सौभाग्य हमें मिल रहा है। जैसे फूल सुगंध ले आता है, हवा प्यारे भौरे को, वैसे ही हमें श्रीकृष्ण का संदेश मिल गया है। श्रीकृष्ण के बारे में सुनकर बहुत ही आनंद हो रहा है और हमारे अंग-अंग में सुख का अनुभव हो रहा है नहीं तो हमारा विरह-व्यथा से जीना मुश्किल हो जाता।

विशेष : अनुप्रास अलंकार, रूपक अलंकार। ब्रज भाषा।
गोपिकाओं का श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम व्यक्त हुआ है।

प्रश्न 2.
जमुना तट देखे नँद नंदन।
मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन।
लोचन तृप्त भए दरसन नैं उर की तपनि बुझानी।
प्रेम-मगन तब भई सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘सूरदास के पद’ से लिया गया है, जिसके रचयिता सूरदास जी हैं।

संदर्भ : श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दर्य का वर्णन इस में देखने को मिलता है।

भाव स्पष्टीकरण : ब्रज की नारियों ने जमुना तट पर श्रीकृष्ण को देख लिया। उन्होंने सिर पर मोर-मुकुट, कानों में मकर के आकार का कुण्डल और शरीर पर पीले रंग का रेश्मी वस्त्र धारण किया हुआ था। शरीर पर चन्दन लेपन से श्रीकृष्ण अत्यंत शोभायमान लग रहे थे। ऐसे श्रीकृष्ण के शोभायमान रूप के दर्शन कर ब्रज नारी की आँखें तृप्त हो गईं। उनके हृदय का ताप बुझ गया। वे श्रीकृष्ण के प्रेम में डूब गईं। उनका हृदय भर आया और वे उस अलौकिक आनंद का शब्दों में वर्णन न कर सकीं। वाणी मुख में ही रह गई।

विशेष : यहाँ श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप-सौन्दर्य का वर्णन हुआ है।
अलंकारः अनुप्रास।
भाषाः ब्रज भाषा जो कोमलकान्त पदावली के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 3.
चोरी करत कान्ह धरि पाए।
निसि-बासर मोहिँ बहुत सतायौ अब हरि अरि हाथहिँ आए।
माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही।
अब तो घात परे हौ लालन, तुम्है भलै मैं चीन्ही।
दोउ भुज पकरि, कहयौ कहँ जैहौ माखन लेउँ मँगाइ।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘सूरदास के पद’ से लिया गया है, जिसके रचयिता सूरदास जी हैं।

संदर्भ : उपरोक्त पद्यांश में एक ग्वालिन बाल कृष्ण को माखन चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लेती है और उन पर क्रोध प्रकट करती है।

व्याख्या : सूरदास इस पद में कृष्ण के माखन चोरी पर रूष्ट ग्वालिन के भावों का वर्णन करते हैं। कृष्ण की रोज़-रोज़ की माखन चोरी से एक गोपी बहुत परेशान थी। कई दिनों से इंतजार में थी कि किसी प्रकार कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ा जाय। आज कृष्ण पकड़ में आ गए तो गोपी कहने लगी – हे कृष्ण, तुमने रात-दिन मुझे बहुत सताया है, रोज-रोज चोरी करके भाग जाते हो, किसी तरह आज पकड़ में आए हो। मेरा सारा दही मक्खन खा लिया और शरारत अलग से की कि सारे बर्तन फोड़कर चले गए। मैं अब-तक सही चोर को पहचान नहीं पाई थी, पर अब मेरे हाथ लगे हो। मैंने भी इस माखन चोर को भलीभाँति पहचान लिया है। इसके बाद गोपी ने कृष्ण के दोनों हाथ पकड़कर कहा – बोलो, अब कहाँ जाओंगे? कहो तो तुम्हारी माँ से सारा दही-मक्खन मँगवा लूँ, जितना तुमने खाया है।

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विशेष : ब्रज भाषा। वर्णनात्मक शैली का उपयोग। ‘वात्सल्य रस।

प्रश्न 4.
तेरी सौं मैं नेकुँ न खायौ, सखा गये सब खाइ।
मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ।
लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ॥
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘सूरदास के पद’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता सूरदास जी हैं।

संदर्भ : श्रीकृष्ण को ग्वालिन ने माखन चुराते पकड़ लिया है। कन्हैया को पकड़ लेने के बाद वह कहने लगी कि तुमने जितना माखन खाया है, वह यशोदा से मँगवा लूंगी। तब कन्हैया ग्वालिन को उत्तर देते हैं।

व्याख्या : सूरदास ने इस पद में बाल-कृष्ण की क्रीडाओं का मनोहारी चित्रण किया है। ग्वालिन ने चोरी करते हुए कान्ह को पकड़ लिया है। वह उन्हें खूब खरी खोटी सुना रही है। तब बालक कृष्ण बाल सुलभ उत्तर देते हैं, उससे ग्वालिन का गुस्सा शांत हो जाता है।
बालक कृष्ण कहते हैं कि मैं तुम्हारी सौगंध खाकर कहता हूँ कि मैंने थोड़ा-सा भी माखन नहीं खाया है। मेरे सब मित्रों ने खाया है। यह कहकर गोपाल ने उनके मुँह को देखा और हँस पड़े। उनके हँसते ही उस ग्वालिन का गुस्सा गायब हो गया। सूरदास कहते हैं कि ग्वालिन ने श्याम को हृदय से लगा लिया। सूरदास उनकी इस लीला पर बलि-बलि जाता है।

विशेष : ब्रज भाषा। श्री कृष्ण के माखन चोरी प्रसंग का सुन्दर वर्णन। सूरदास का बाल लीला वर्णन अनुपम है।

सूरदास के पद कवि परिचय :

सूरदास हिन्दी साहित्य के भक्ति काल के कृष्ण भक्ति शाखा के मूर्धन्य कवि हैं। आपका जन्म 1483 में दिल्ली के पास सीही नामक गाँव में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सूरदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली थी।

सूरदास के काव्य का मूलाधार ‘भागवत पुराण’ है। ‘सूरसागर’, ‘सूरसारावली’, ‘साहित्य लहरी’ आपकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। सूरदास की समस्त कीर्ति का आधार ‘सूरसागर’ है। जनश्रुति तथा वार्ता साहित्य के अनुसार इसमें सवा लाख पद थे किन्तु अब तक आठ-दस हजार पद ही प्रकाश में आ सके हैं।

सूरदास ने भक्ति के सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य भाव को स्वीकार किया है। सूरदास को अष्टछाप के कवियों में श्रेष्ठ माना जाता है।

सूरदास के पद पदों का आशय :

प्रस्तुत पदों में सूरदास ने श्रीकृष्ण के रूप सौन्दर्य, माखनचोरी प्रसंग और गोपिकाओं के समर्पण भाव का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। इसमें विविध भावमयी ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए सरस काव्य की सृष्टि की है।

सूरदास के पद पदों का भावार्थ :

1) ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी।
जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं।
जैसे सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी।
अति आनंद होत है तैसैं, अंग-अंग सुख रागी।
ज्यों दरपन मैं दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी।
तैसैं सूर मिले हरि हमकौं, बिरह-बिथा तन त्यागी॥

गोपियाँ कहती हैं- हे उद्धव! आज हम सौभाग्यशाली हो गई हैं, धन्य-धन्य हो गई हैं; अपनी जिन आँखों से तुमने हमारे प्रिय कृष्ण को देखा है, वे आँखें अब हमें मिल गई हैं अर्थात् हम तुम्हारी आँखों में श्याम की आँखें, श्याम की मूरत देख रहें हैं। जैसे अनुरागी भौरे के प्रिय सुमन की गंध पवन ले आती है और उस गंध से बंधा भौंरा अपने प्रिय सुमन तक पहुँच जाता है, वैसे ही तुम्हें देखकर हमें आनन्द हो रहा है। तुम भी अपने अंग-अंग में कृष्ण का सुख राग (प्रेम) भर कर ले आए हो। जैसे दर्पण में अपना रूप देखने से दृष्टि अति रुचिकर लगने लगती है, उसी प्रकार तुम्हारे नेत्र रूपी दर्पण में कृष्ण के नेत्रों के दर्शन कर हमें बहुत अच्छा लग रहा है। जिन नेत्रों से तुमने श्याम को देखा है, उन्हीं नेत्रों में हम झांक कर देख रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार आज हमें साक्षात् श्याम ही मिल गए हैं और हमारे तन ने विरह-व्यथा को छोड़ दिया है, श्याम-मिलन की सुखानुभूति हमें हो रही है।

शब्दार्थ :
बड़-भागी – भाग्यशाली;
बिलोके – देखना;
सुमन – फूल;
मधुप – भ्रमर;
दरपन – आईना;
हरि – कृष्ण;
बिथा – व्यथा।

2) जमुना तट देखे नँद नंदन।
मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन।
लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी।
प्रेम-मगन तब भई सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी।
कमल-नयन तट पर हैं ठाढ़े, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी।
सूरदास-प्रभु अंतरजामी, ब्रत-पूरन पगधारी॥

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गोपियों ने नंदनंदन भगवान श्रीकृष्ण को यमुना किनारे पर नटवर-नागर वेश में देखा। सिर पर मोर मुकुट है, कानों में मकराकृत कुंडल हैं, कटि में पीतांबर और शरीर पर चंदन का लेप है। इस नटवर-नागर रूप के दर्शन मात्र से गोपियों के तृणित (प्यासे) नेत्र तृप्त हो गए। उनके हृदय में प्रज्वलित प्रेम की ज्वाला शान्त हो गई। वे सुंदर ब्रजबालाएँ प्रेम-मग्न हो गईं। उनका हृदय भर आया और वे उस अलौकिक आनंद का शब्दों में वर्णन न कर सकी। वाणी मुख में ही रह गई। कमल के समान सुंदर नेत्रवाले कृष्ण यमुना तट पर खड़े हैं, पर गोपियाँ लाजवश मिलने में संकोच कर रही हैं। सूरदास कहते हैं कि प्रभु तो सबके हृदय की बात को जानने वाले हैं, गोपियों ने प्रभु-मिलन का जो व्रत अपने हृदय में धारण किया था, उसे पूरा करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आगे कदम बढ़ाकर गोपियों का स्वागत किया।

शब्दार्थ :
जमुना – यमुना;
तट – किनारा;
तन – शरीर;
लोचन – आँखें;
दरसन – दर्शन;
उर – हृदय;
बानी – वाणी;
सकुचहिं – संकोच करना;
अंतरजामी – अंतर्यामी।

3) चोरी करत कान्ह धरि पाए।
निसि-बासर मोहिँ बहुत सतायौ अब हरि अरि हाथहिँ आए।
माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही।
अब तो घात परे हौ लालन, तुम्है भलै मैं चीन्ही।
दोउ भुज पकरि, कहयौ कहँ जैहौ माखन लेउँ मँगाइ।
तेरी सौं मैं नेहुं न खायौ, सखा गये सब खाइ।
मुख तन चितै, बिहॅसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ।
लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ।।

कृष्ण की रोज़-रोज़ की माखन चोरी से एक गोपी बहुत परेशान थी। कई दिनों से इंतजार में थी कि किसी प्रकार कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ा जाय। आज कृष्ण पकड़ में आ गए तो गोपी कहने लगी – हे कृष्ण, तुमने रात-दिन मुझे बहुत सताया है, रोज-रोज चोरी करके भाग जाते हो, किसी तरह आज पकड़ में आए हो। मेरा सारा दही-मक्खन खा लिया और शरारत अलग से की कि सारे बर्तन फोड़कर चले गए। मैं अब-तक सही चोर को पहचान नहीं पाई थी, पर अब मेरे हाथ लगे हो। मैंने भी इस माखन चोर को भलीभाँति पहचान लिया है। इसके बाद गोपी ने कृष्ण के दोनों हाथ पकड़कर कहा – बोलो, अब कहाँ जाओगे? कहो तो तुम्हारी माँ से यह सारा दही-माखन मंगा लूँ, जितना तूने खाया है! कृष्ण ने बड़े भोलेपन से उत्तर दिया – मैं तेरी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि मैंने तेरा माखन थोड़ा-सा भी नहीं खाया है, यह तो सारे सखा मिलकर खा गए हैं। कृष्ण की इस भोली बात पर जैसे ही गोपी ने कृष्ण की ओर देखा तो कृष्ण मुस्कराने लगे। कृष्ण की इस मुस्कराहट पर मोहित गोपी का सारा क्रोध शान्त हो गया और मन में प्रेम भाव उदय हो गया। प्रेमभाव में गोपी ने कान्हा को अपने हृदय से लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि मैं गोपी-कृष्ण के इस प्रेम भाव पर बलि-बलि जाता हूँ।

शब्दार्थ :
निसि-बासर – रात-दिन;
सखा – मित्र;
अचगरी – आश्चर्य।

सूरदास के पद Summary in Kannada

सूरदास के पद Summary in Kannada 1

सूरदास के पद Summary in Kannada 2

सूरदास के पद Summary in English

In this collection of verses, the poet Surdas pays glowing tributes to Lord Krishna’s beauty, his act of stealing butter, and his relationship with the milkmaids.

1. The milkmaids say to Uddhava (who is the friend and counsellor of Lord Krishna) that they too have become sacred and that they are now blessed because they can see Lord Krishna in the eyes of Uddhava, who has seen Lord Krishna himself; the milkmaids can see the figure of Krishna in the eyes of Uddhava. Just as the wind brings the sweet smell of flowers to the bee and following the scent, the bee reaches its beloved flower, similarly, the milkmaids are pleased to see Uddhava. Uddhava is filled to the brim with love for Lord Krishna, which the milkmaids feel blessed to be in the presence of. Just as one feels happy by looking at one’s reflection in the mirror, the milkmaids to are feeling happy looking at Uddhava’s eyes which carry in them the image of Lord Krishna. They feel happy to be looking into the same eyes that have seen Lord Krishna. Thus, Surdas says that in this manner, it is as if we have witnessed Lord Krishna in the flesh, and our longing for Krishna is gone since we feel as if we have met Lord Krishna in reality.

2. The milkmaid’s sight Lord Krishna on the banks of the river Yamuna. He is in one of His divine forms. He is wearing a crown of peacock feathers on His head, large fish-shaped earrings on His ears, a yellow silk cloth on his waist, and His body is covered with the paste of the sandalwood tree. Only a glimpse of this form of Lord Krishna has satisfied the eyes of the milkmaids, which were thirsting for a divine vision of the Lord. The fire that was raging in their hearts has been quenched. The beautiful maidens are enraptured with this vision of Lord Krishna. Their hearts began to beat faster, and due to the excess of love that they feel, they are unable to make any utterance. Their speech is only able to reach the mouth, but cannot be uttered by the tongue. The beautiful Lord Krishna (who is like a lotus flower in bloom) is standing on the banks of the river Yamuna, but the milkmaids are feeling shy to go forth and meet the Lord. The poet Surdas says that Lord Krishna knows what is in the heart of every person, and thus, understands the bashfulness of the milkmaids. The milkmaids had taken a vow in their hearts, to meet Lord Krishna and in order to fulfil their vow, Lord Krishna Himself comes forward and greets the milkmaids.

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3. Once, a milkmaid was very distressed because of Lord Krishna’s act of stealing butter daily. She was waiting for many days, hoping to catch Lord Krishna red-handed while he was stealing butter. Finally, the day that the milkmaid catches Lord Krishna red-handed in the act of stealing butter, she says to Him – “Oh Lord Krishna, you have troubled me day and night by stealing butter every day and running away; today I have caught you in the act. You ate all my curds and butter aside from your naughtiness with which you broke all the earthen vessels which were used to store the curds and butter. Until now I was unable to recognize the real thief, but now I have caught you in the act of stealing.

Now I have recognized the butter-thief very well.” After this, the milkmaid grabs Lord Krishna’s hands and asks Him where He will run away now. She asks him whether she should demand from His mother all the curds and butter that He has stolen and eaten. With great innocence, the young Lord Krishna swears upon the milkmaid that he has not eaten the curds and butter and that all his friends have eaten it together. When the milkmaid looks at Lord Krishna after He gives this excuse, He smiles at her. Lord Krishna’s wonderful smile melts away the anger of the milkmaid and her mind is filled with love instead. She embraces Lord Krishna. The poet Surdas says that he is mesmerized by this love and affection between the young Lord Krishna and the milkmaids.