2nd PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Gaurav Chapter 8 यात्रा जापान की

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Karnataka 2nd PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Gaurav Chapter 8 यात्रा जापान की

यात्रा जापान की Questions and Answers, Notes, Summary

I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
लेखिका जापान किस हेतु गई थीं?
उत्तर:
लेखिका अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने हेतु जापान गई थीं।

प्रश्न 2.
जापान के होटलों का रिवाज़ क्या है?
उत्तर:
जापान के होटलों का रिवाज़ है कि वहाँ सबसे पहले गर्म पानी पीने के लिए दिया जाता है।

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प्रश्न 3.
जापान का गुणधर्म क्या है?
उत्तर:
शालीनता जापान का गुणधर्म है।

प्रश्न 4.
‘तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरेन स्टड़ीज़’ के निदेशक कौन हैं?
उत्तर:
‘तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरेन स्टड़ीज़’ के निदेशक प्रोफेसर फुजिई ताकेशी हैं।

प्रश्न 5.
पुस्तकालय से बाहर निकलते समय अलार्म क्या जताता है?
उत्तर:
पुस्तकालय से बाहर निकलते समय अलार्म इस लिए होता है कि आपके पास कोई छुपाई हुई पुस्तक है क्या इसका पता चले।

प्रश्न 6.
लेखिका ने किसे अनुशासन प्रिय कहा है?
उत्तर:
लेखिका ने जापानी लोगों को अनुशासन प्रिय कहा है।

प्रश्न 7.
शिन्कान्सेन’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
‘शिन्कान्सेन’ का शाब्दिक अर्थ है- न्यू ट्रंक लाइन।

प्रश्न 8.
‘पानी’ के लिए जापानी भाषा में कौन-सा शब्द है?
उत्तर:
‘पानी’ के लिए जापानी भाषा में शब्द है- मिजु।

प्रश्न 9.
‘स्लम डाग मिलियनेर’ फिल्म किसकी पुस्तक के आधार पर बनी है?
उत्तर:
‘स्लम डाग मिलियनेर’ फिल्म विकास स्वरूप की पुस्तक पर बनी है।

प्रश्न 10.
‘नारा’ का प्रसिद्ध मंदिर कौन सा है?
उत्तर:
‘नारा’ का प्रसिद्ध मंदिर है – तोदायजी।

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प्रश्न 11.
गौतम बुद्ध को जापानी भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर:
गौतम बुद्ध को जापानी भाषा में दायबुत्सु कहते हैं।

प्रश्न 12.
नारा मंदिर में बुद्ध प्रतिमा की ऊंचाई कितनी है?
उत्तर:
नारा मंदिर में बुद्ध प्रतिमा की ऊँचाई 55 फुट है।

प्रश्न 13.
एक जमाने में कौन-सा शहर जापान की राजधानी हुआ करता था?
उत्तर:
एक जमाने में नारा शहर जापान की राजधानी हुआ करता था।

अतिरिक्त प्रश्न :

प्रश्न 1.
एयर इंडिया की उड़ान कितने मिनट विलम्ब से चली?
उत्तर:
एयर इंडिया की उड़ान तीस मिनट विलम्ब से चली।

प्रश्न 2.
लेखिका और उनके साथी तोक्यो में किस होटल में ठहरे?
उत्तर:
लेखिका और उनके साथी तोक्यो में सनपेटियो होटल में ठहरे।

प्रश्न 3.
लेखिका और उनके साथियों के पथ-प्रदर्शक कौन थे?
उत्तर:
सुरेश ऋतुपर्ण लेखिका और उनके साथियों के पथ-प्रदर्शक थे।

प्रश्न 4.
‘स्टेशन’ को जापानी भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर:
‘स्टेशन’ को जापानी भाषा में ‘इकी’ कहते हैं।

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प्रश्न 5.
‘ओके’ को जापानी भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर:
‘ओके’ को जापानी भाषा में ‘ऊकी’ कहते हैं।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

प्रश्न 1.
जापान के भारतीय रेस्तराँ ‘कलकत्ता’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तोक्यो विश्वविद्यालय के अतिथि प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण नमूदार उन्हें भारतीय रेस्तराँ ले गए। जहाँ की एक दीवार पर ताजमहल के सामने ऊँटों की तसवीर लगी थी और उसपर Incredible India लिखा था। हिन्दी संगीत चल रहा था। वहाँ की रीतिनुसार पहले उनको गरम पानी पीने को दिया। भारतीय मसालों की और डोसा-साम्भार की सुगन्ध वहाँ छाई हुई थी। वहाँ की दालचीनी काली मिर्च डली हुई मसाला चाय उन्हें पसन्द आई। और तड़केवाली साबुत काली उड़द की दाल, तन्दूरी रोटी, आलू के पराँठे और सरसों का साग खाकर तो ऐसे लगा उन्हें जैसे पंजाब में बैठे स्वादिष्ठ खाना खा रहे है।

प्रश्न 2.
जापान के रेलवे स्टेशन और रेल-यात्रा के बारे में लेखिका क्या कहती हैं?
उत्तर:
जापान में रेल-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लेखिका कहती हैं कि जापान में कदम-कदम पर रेलवे स्टेशन हैं। रेलें कई धरातलों पर चलती रहती हैं। प्लेटफार्म पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लाल लकीरें खिंची हैं। हर डिब्बा ऐन उस लकीर के सामने ही पड़ता है। गाड़ी जैसे रुकती है, टिकट खाँचे में डालकर अंदर घुसो, उस पार जाकर अपना टिकट उठा लो। रेल के अंदर बैठने के स्थान कम और खड़े होने के ज्यादा हैं। वृद्धों, स्त्रियों, रोगियों के लिए courtesy seats अर्थात् सौजन्यस्थान आरक्षित हैं। रेल में चढ़ते समय धक्का-मुक्की नहीं होती। शालीनता जापान का गुण धर्म है। रेल में लोग खड़े-खड़े पढ़ते हैं। हर जगह स्वच्छता। यहाँ की सबसे तेज गति से चलनेवाली रेल है – ‘शिन्कान्सेन’ जिसे बुलेट ट्रेन भी कहते हैं।

प्रश्न 3.
‘टफ्स’ के पुस्तकालय के बारे में लिखिए।
उत्तर:
टफ्स का पुस्तकालय अपने आप में अद्भुत है। इस चार मंजिल इमारत की हर मंजिल पर विशाल वाचनालय है। पुस्तकालय में कुल 6,18,615 पुस्तकें हैं। विद्युतचालित आलमारियों में रखी ये पुस्तकें मात्र एक बटन दबाने से सामने उपलब्ध होती हैं। आप जी-भरकर पढ़िए, पन्ने पलटिये या नोट्स बनाइये, वापस बटन दबाइए, आलमारी अपने-आप बंद हो जाएगी। इससे जगह की बचत और पुस्तकों की सुरक्षा भी होती है। पुस्तकों के बीच मनमाना समय गुजारने के बाद जब पुस्तकालय के द्वार से बाहर निकलते हैं, एक अलार्म जता देता है कि आपके पास कोई छुपी हुई पुस्तक नहीं है। यहाँ इंडिक भाषा विभाग में कई दुर्लभ ग्रंथ देखने को मिलते हैं। यहाँ हिन्दी, अवधी, ब्रज भाषा, राजस्थानी, भोजपुरी, पहाड़ी और मैथिली की अनेकों पुस्तकें हैं। यहाँ पर कई दुर्लभतम पुस्तकों के लिए ‘नवलकिशोर संग्रह’ है जिसमें 187 ग्रन्थ उपलब्ध है। सरस्वती, विशाल भारत और माधुरी के अंक भी यहाँ उपलब्ध हैं। यहाँ फीजी का प्रथम हिन्दी उपन्यास ‘डउका पुरान’ भी देखने को मिलता है।

प्रश्न 4.
जापान के ‘बुलेट-ट्रेन’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जापान की सबसे तेज़ गति रेल ‘शिन्कान्सेन’ है जिसका शाब्दिक अर्थ है न्यू ट्रंक लाइन । इस को बुलेट ट्रेन भी कहते हैं। यह 16 डिब्बों की गाड़ी है। हर गाड़ी में 1300 यात्रियों के बैठने का प्रबन्ध है। 1300 फीट लम्बी इस रेल में 40 मोटर जनरेटर लगे होते हैं। जिस वक्त यह 170 कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती है, कहीं भी रुकने के लिए कम-से-कम 5 कि.मी. की गुंजाइश चाहिए। 8600 कर्मियों की कार्यक्षमता का उपयोग इसके संचालन में प्रतिदिन लगता है। जापान के निवासी इस रेल से यात्रा करना एक मौलिक अनुभव मानते हैं जहाँ गंतव्य से अधिक गति का महत्व है, मंजिल से ज्यादा सफ़र की अहमियत।

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प्रश्न 5.
ओसाका के किले का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘जो’ का अर्थ है किला। ओसाका जो 1585 ई. में सम्राट तोयोतोमी हिदेयोशी ने बनवाया था। विशाल परिसर में हरियाली और रंगबिरंगे पुष्प-पादपों से घिरा यह किला अनेक आख्यानों का पुंज है। इनके सब हिस्सों का पुनर्निर्माण हुआ है। किले को लेकर कई किस्से-कहानियाँ है। किले के चारों ओर गहरी खाई और जलाशय है। किले का प्रवेश-द्वार एक काला विशाल फाटक है और काले पत्थर की प्राचीरें है। ओसाका जो कई बार बना और नष्ट हुआ। वहाँ का मन्दिर जो ओसाका होंगाजी ने बनाया था, लकड़ी का होने के कारण कई बार जल चुका था, एक बार बिजली भी गिरी 1931 में उसका नवीनीकरण हुआ। वही पर ओसाका जो का संग्रहालय भी है।

प्रश्न 6.
‘तोदायजी मंदिर’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रेल से यह यात्री तोदायजी मंदिर गए जिसकी स्थापना 743 में हुई। गौतम बुद्ध को ‘दायबुत्सु’ कहते हैं। विशाल परिसर में काली भूरी लकड़ी का महाकाय स्थापत्य है जो बिना सीमेंट और पत्थर के टिका हुआ है। बड़े से आँगन के बीचोंबीच एक गोलाकार वृत्त में आग जलती है जिसे दिव्य ज्योति मानकर लोग उसे माथेपर लगाते हैं। दानपत्र है लेकिन दान देने की बाध्यता नहीं। प्रवेश द्वार के दोनों तरफ प्रहरी की प्रतिमाएँ है, एक का मुँह खुला है, दूसरी का बन्द। गर्भगृह में 55 फुट ऊँची बुद्ध की मूर्ति है। जो तांबे की है और जिसका वजन 500 टन है। इस गर्भगृह को दायबुत्सु देन कहते हैं। बौद्ध प्रतिमा के नीचे एक छोटा सा मार्ग है, बहुत ही सँकरा, उमें से जो कई पार निकलता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है मानते हैं।

प्रश्न 7.
जापान के ‘हिरन-वन’ के बारे में लिखिए।
उत्तर:
हिरन वन में हिरन भारतीय हिरनों की तुलना में ज्यादा हट्टे-कट्टे है, दूर से देखने पर तगड़े, बछड़ों की तरह है। वन में जगह जगह आटे के बिस्किटों का पैकेट मिलता है, १५० येन में उसे खरीदकर लोग खिलाते हैं।

वे अपने सुडौल गर्दन ऊपर कर उसे खा लेते हैं। कुछ लोग बिस्किटों के जगह हिरनों का केले खिलाते – हैं। आसपास के हिरन बिना डरे लेखिका के हाथ से केला छीन कर खा जाते हैं।

प्रश्न 8.
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के बारे में लेखिका के क्या विचार हैं?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन २८ नवंबर को सुबह दस बजे हुआ। उतने सारे जापानी विद्वानों का हिन्दी भाषा और लेखन से जुड़ा रहना देखकर लेखिका को अचरज हुआ। हिन्दी-उर्दू की सामर्थ्य व समृद्धि के प्रति उन सबकी निष्ठा और आस्था सराहनीय थी। प्रथम सत्र की अध्यक्षता अवकाश प्राप्त तोमियो मिज़ोकामी ने की। उन्होंने हिन्दी जापानी के मध्य सेतु बनाने का एक अद्भुत कार्य किया है। जापान में हिन्दी गाने भी बहुत पसन्द किए जाते हैं। सभागार में वे प्रो० मालवीय से मिले। वहाँ पर जैसे सारा इलाहाबाद इकट्ठा हुआ था। जिनके किताब पर स्लमडॉग मिलियनेर’ फिल्म बनी वह विकास स्वरूप भी वहाँ मिले। उद्घाटन सत्र में सबका परिचय देना हुआ, विशेष आलेख पढ़े गए। छात्रों ने उसे पूरी एकाग्रता से सुना, हिन्दी में प्रश्न पूछे। लेखिका को लगा कि डॉ. फुजिई और डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण ने संवाद-भाषा के रूप में हिन्दी सिखाने में छात्रों के साथ भरपूर परिश्रम किया है।

प्रश्न 9.
जापान में हिन्दी के प्रभाव-प्रसार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
लेखिका जब अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन गई तो वहाँ के जापानी विद्वानों को हिन्दी भाषा व लेखक की जानकारियों जुड़ा देखना-सुनना अच्छा लगा। हिन्दी-उर्दू की सामर्थ्य व समृद्धि के प्रति उन सब की आस्था और निष्ठा सराहनीय है। जापान में हिन्दी फिल्मी गाने भी बहुत पसन्द किये जाते हैं। मिजेकामी ने हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय गानों का अनुवाद-संकलन किया है जिसमें तीन सौ गीत है। ‘टफ्स’ में हिन्दी-उर्दू शिक्षण की एक शताब्दी बीत गई है। दोनों भाषाओं में यहाँ शोधकार्य करने की सुविधा है। विदेशी भाषा अध्ययन संस्थान के कई विद्यार्थी है जो हिन्दी वार्तालाप की कोशिश कर रहे हैं। पुस्तकालय में दुर्लभ और बहुत ही महत्वपूर्ण सामग्रीवाले हिन्दी किताबें हैं। इस तरह जापान में हिन्दी का प्रचार-प्रसार होता है।

III. निम्नलिखित वाक्य किसने किससे कहे?

प्रश्न 1.
‘यहाँ तो डेंटिस्ट मक्खी मारते होंगे।
उत्तर:
यह वाक्य ममता कालिया ने ऋचा मिश्र से कहा।

अतिरिक्त प्रश्न :

प्रश्न 1.
‘वह देखिये फूजी पर्वत।’
उत्तर:
इशिदा ने लेखिका और उसके साथियों से कहा।

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प्रश्न 2.
‘बताइये, गटापार्चा क्या होता है?’
उत्तर:
सुरेश जी ने लेखिका को कहा।

प्रश्न 3.
‘हफ्ते भर तक यही खाऊँगा और क्या?’
उत्तर:
हरजेन्द्र चौधरी ने लेखिका और उनके साथियों से कहा।

IV. ससंदर्भ स्पष्टीकरण कीजिए :

प्रश्न 1.
“यहाँ टिकट खाँचे में डाल कर जल्द अंदर घुसो, उस पार जाकर अपनी टिकट उठा लो।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘यात्रा जापान की’ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी लेखिका ममता कालिया हैं।

संदर्भ : सुरेश ऋतुपर्ण ने यह वाक्य मेट्रो-ट्रेन टिकट निकालते समय प्रतिनिधियों से कहा।

स्पष्टीकरण : सुरेश ऋतुपर्ण ने यह वाक्य रेल-टिकट निकलवाते समय प्रतिनिधियों से धैर्य के साथ कहा – यहाँ टिकट खाँचे में डालकर जल्द अन्दर घुसो, उस पार जाकर अपनी टिकट उठा लो। मेट्रो-ट्रेन के टिकट के लिए सावधानी व फुर्ती दोनों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
“यहाँ तो डेंटिस्ट मक्खी मारते होंगे।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘यात्रा जापान की’ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी लेखिका ममता कालिया हैं।

संदर्भ : जापान की सभी लड़कियाँ खाना खाने के बाद हर बार, बिना नागा दाँत साफ़ करती हैं।

स्पष्टीकरण : अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने हेतु छः सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल जापान की यात्रा करते हैं। जापानियों के रीति-रिवाज, तथा जापान में हिन्दी प्रचार-प्रसार का वर्णन इस यात्रावृत्तांत में मिलता है। विदेशी भाषा अध्ययन संस्थान के कार्यक्रम के दौरान लेखिका और ऋचा मिश्र बाथरूम जाते हैं। वहाँ उन्हें एक दिलचस्प नजारा देखने को मिलता है। वॉशबेसिन के सामने छात्राओं की लम्बी कतार है। सबने अपने पर्स से टूथब्रश और टूथ पेस्ट निकालकर रखे हैं। बाद में पता चला, सभी लड़कियाँ खाना खाने के बाद हर बार, बिना नागा दाँत साफ़ करती हैं। इसे सुनकर लेखिका ममता कालिया ने इस वाक्य को कहा।

प्रश्न 3.
“इनकी हर मंज़िल पर इतनी जगह जानबूझकर छोड़ी गई है जो भूकम्प के धक्के सह सके।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘यात्रा जापान की’ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी लेखिका ममता कालिया हैं।

संदर्भ : जापान में इतने तूफान और भूचाल आते हैं, इतनी गगनचुम्बी इमारते फिर क्यों बनायी गयीं हैं? इस प्रश्न के उत्तर में सुरेश जी इस वाक्य को कहते हैं।

स्पष्टीकरण : ओसाका यूनिवर्सिटी के अंतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए ममता कालिया ने प्रतिनिधि मंडल के साथ जापान की यात्रा की। जापान में हुई तकनीकी प्रगति, जापानियों की कर्मनिष्ठता का वर्णन इसमें देखने को मिलता है। वे तोक्यो नगर को देखने निकलीं। वे कहती हैं जैसे-जैसे दिन छुपता है, तोक्यो उजागर होता जाता है – गलियों में, बाजारों में, सागर और किनारों में। ममता कालिया सुरेश ऋतुपर्ण से पूछती हैं – जापान में इतने भूचाल और तूफान आते हैं, इतनी गगनचुम्बी इमारतें क्यों बनायी गयी हैं? इस प्रश्न के उत्तर में सुरेश जी कहते हैं – इनकी हर मंजिल पर इतनी जगह जानबूझकर छोड़ी गई है जो भूकम्प के झटके सह सके।

प्रश्न 4.
“यहाँ प्रकृति की तूलिका में सात से अधिक रंग दिखाई दे रहे हैं।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘यात्रा जापान की’ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी लेखिका ममता कालिया हैं। ओसाका शहर का वर्णन करते हुए ममता कालिया जी ने इसे कहा।

स्पष्टीकरण : जापान की राजधानी तोक्यो का कार्यक्रम समाप्त कर लेखिका का दल बुलेट ट्रेन से ओसाका शहर पहुँचा। ओसाका स्टेशन पर उच्चायोग के प्रतिनिधि वैन लेकर इंतजार कर रहे थे। वैन बहुत क्षिप्र गति से चल रही थी। सड़क की दोनों ओर बड़ी इमारतें थीं। यहाँ अजनबी नामपटों के साथ कुछ ऐसे नामपट भी झलक जाते हैं जिनकी हम भारतीयों को सुनने की, देखने की आदत पड़ गयी है जैसे हिताची, मित्सुबिशि, काकुरा आदि। चमचमाती इमारतों के बाद रंगबिरंगे पेड़ों का सिलसिला शुरू हो जाता है। लेखिका कहती हैं – यहाँ प्रकृति की तूलिका में सात से अधिक रंग दिखाई दे रहे हैं – मोमिजी की पत्तियाँ लाल हैं, कुछ नारंगी और गुलाबी रंग भी मिले हैं, साकुरा के पेड़ सफेद फूलों से ढंके हैं। हरा रंग यहाँ चटक हरा है जैसे पत्तों पर किसी चित्रकार ने एक बार फिर रंग पोत दिया हो।

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प्रश्न 5.
“यह किला जापानी संघर्षधर्मिता और जिजीविषा का प्रतीक है।”
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘यात्रा जापान की’ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी लेखिका ममता कालिया हैं।

संदर्भ : जापान के ओसाका किले का वर्णन करते हुए लेखिका इसे कहती हैं।

स्पष्टीकरण : जापानी में ‘जो’ का अर्थ है किला, ‘जी’ का अर्थ है मंदिर। ओसाका ‘जो’ 1585 ई. में सम्राट तोयोतोमी हिदेयोशी ने बनवाया था। विशाल परिसर में हरियाली और रंगबिरंगे पुष्प पादपों से घिरा यह किला अनेक आख्यानों का पुंज है। कई बार इसके कुछ हिस्सों को पुनर्निर्माण हुआ। किले के चारों ओर गहरी खाई और जलाशय है। किले का प्रवेश-द्वार एक काला विशाल फाटक है और काले पत्थर की प्राचीरें हैं। किले के अंदर मंदिर, संग्रहालय, आदि हैं जो देखने लायक हैं। यहाँ लकड़ी का इतना ज्यादा प्रयोग हुआ है कि कई बार इसमें आग लगने की दुर्घटनाएँ होती रहीं। ओसाका ‘जो’ कई बार बना और नष्ट हुआ। जापानवासियों में अपने सम्राट और अपनी संस्कृति के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम है। यह किला जापानी संघर्षधर्मिता और जिजीविषा का प्रतीक है।

V. वाक्य शुद्ध कीजिए :

प्रश्न 1.
हम सातवीं मंज़िल में हैं।
उत्तर:
हम सातवीं मंजिल पर हैं।

प्रश्न 2.
पीने के लिए गरम पानी अवश्य मिलती है।
उत्तर:
पीने के लिए गरम पानी अवश्य मिलता है।

प्रश्न 3.
छात्रों ने पूरी एकाग्रता से हमें सुनी।
उत्तर:
छात्रों ने पूरी एकाग्रता से हमें सुना।

प्रश्न 4.
बाजार का कोई शोर सुनाई नहीं देती।
उत्तर:
बाजार का कोई शोर सुनाई नहीं देता।

प्रश्न 5.
होटल में हिन्दी संगीत चल रही है।
उत्तर:
होटल में हिन्दी संगीत चल रहा है।

VI. निम्नलिखित वाक्यों को सूचनानुसार बदलिए :

प्रश्न 1.
रात की दावत हरजेन्द्र चौधरी के घर पर थी। (वर्तमान काल में बदलिए)
उत्तर:
रात की दावत हरजेन्द्र चौधरी के घर पर है।

प्रश्न 2.
यहाँ हिन्दी-उर्दू प्रेमियों का जमावड़ा है। (भविष्यत्काल में बदलिए)
उत्तर:
यहाँ हिन्दी-उर्दू प्रेमियों का जमावड़ा होगा।

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प्रश्न 3.
कुछ देर तक हम इसका वैभव देखते हैं। (भूतकाल में बदलिए)
उत्तर:
कुछ देर तक हम इसका वैभव देखते रह गए।

VII. अन्य लिंग रूप लिखिए :

विद्वान, छात्र, युवक, पत्नी, बालक।

  1. विद्वान – विदुषी
  2. छात्र – छात्रा
  3. युवक – युवती
  4. पत्नी – पति
  5. बालक – बालिका

VIII. अन्य वचन रूप लिखिए :

दुकान, सुविधा, पुस्तक, टिकट।

  1. दुकान – दुकानें
  2. सुविधा – सुविधाएँ
  3. पुस्तक – पुस्तकें
  4. टिकट – टिकटें

IX. विलोम शब्द लिखिए :

सुगंध, समर्थ, सौम्य, सुरक्षा।

  1. सुगंध × दुर्गंध
  2. समर्थ × असमर्थ
  3. सौम्य × वैषम्य
  4. सुरक्षा × असुरक्षा

X. निम्नलिखित शब्दों के साथ उपसर्ग जोड़कर नए शब्दों का निर्माण कीजिए :

शासन, विश्वास, चालन, व्यवस्थित।

  1. शासन – अनु + शासन = अनुशासन
  2. विश्वास – अ + विश्वास = अविश्वास
  3. चालन – सु + चालन = सुचालन (सं + चालन = संचालन)
  4. व्यवस्थित – अ + व्यवस्थित = अव्यवस्थित

यात्रा जापान की लेखिका परिचय :

ममता कालिया का जन्म 2 नवम्बर 1940 ई. को वृंदावन में हुआ। आपने अपने पिता श्री विद्याभूषण अग्रवाल से साहित्य सृजन की प्रेरणा पाई। आपकी शिक्षा नागपुर, मुम्बई, पुणे, इन्दौर और दिल्ली में हुई। आपने 1963 ई. में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि पाई। दिल्ली के दौलतराम कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया, तत्पश्चात एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका नियुक्त हुईं। बाद में इलाहाबाद के महिला सेवा सदन कॉलेज में प्राचार्या के पद पर कार्यरत रहीं। 2001 ई. में सेवा निवृत होने के उपरान्त 5 वर्ष तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका ‘हिन्दी’ की संपादिका रहीं। आपको अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘यशपाल स्मृति सम्मान’, ‘साहित्य भूषण’, ‘सीता स्मृति सम्मान’, ‘लमही कथा सम्मान’ आदि शामिल हैं।

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आपकी रचनाएँ :
कहानी-संग्रह : ‘छुटकारा’, ‘जांच अभी जारी है’, ‘सीट नंबर छः’, ‘प्रतिदिन’ आदि।
उपन्यास : ‘नरक दर नरक’, ‘दौड़’, ‘बेघर’, ‘अंधेरे का ताला’ आदि।
संस्मरण : ‘कितने शहरों में कितनी बार’ आदि।

यात्रा जापान की Summary in Hindi

प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत में जापान के तोक्यो विश्वविद्यालय में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का, जापान के लोगों का रहन-सहन, भाषा, सभ्यता, संस्कृति के अलावा वहाँ की प्राकृतिक छटा, ऐतिहासिक धरोहरें, किले, मंदिर, पुस्तकालय, मेट्रो-ट्रेन इत्यादि की विस्तृत जानकारी दी गयी है।

तोक्यो में ‘कलकत्ता’ नामक भारतीय रेस्तराँ है। यहाँ दीवारों पर भारतीय चित्रकारी तथा भारतीय व्यंजनों की व्यवस्था है। सबसे पहले गरम पानी पीने के लिए दिया जाता है। पानी के लिए जापानी भाषा में शब्द है – ‘मिजु।’ शालीनता जापानियों का गुणधर्म है। जापान के रेल स्टेशनों में हर काम पलक झपकते करना होता है। जापानी यात्री धक्का-मुक्की नहीं करते। हमारे देश की तरह महिलाओं के लिए, बुजुर्गों तथा विकलांगों के लिए सीटों का वर्गीकरण नहीं होता है।

तोक्यो के पुस्तकालय में देश-विदेश की अनेक विषयों की पुस्तकें हैं। विद्युतचालित अलमारियों में पुस्तकें सुरक्षित रहती हैं। यहाँ की न्यू ट्रंक लाइन को बुलेट ट्रेन भी कहते हैं। यह 170 किलोमीटर प्रति घंटा चलनेवाली ट्रेन है। इसमें 16 डिब्बे होते हैं और 1300 यात्री सवार हो सकते हैं। तोक्यो और ओसाका के बीच 66 गुफाएँ हैं।

किले को ‘जो’ कहते हैं और ‘जी’ का अर्थ होता है मंदिर। सन् 1585 में सम्राट तोयोतोमी हिदेयोशी नामक सम्राट ने ओसाका का किला बनवाया था। किले के चारों ओर खाई और जलाशय है। प्रवेश द्वार पर विशाल फाटक है। यह किला जापानियों के संघर्ष का प्रतीक है। नारा का प्रसिद्ध मंदिर है – तोदायजी, जिसकी स्थापना 743 ई. में हुई थी। मंदिर के अधिष्ठाता गौतम बुद्ध (दायबुत्सु) हैं। काली व भूरी लकड़ी की स्थापत्य कला देखने लायक है। तोदायजी से जुड़ा एक हिरन वन है। मंदिर से हिरन-वन तक का रास्ता प्राकृतिक छटा से ओतप्रोत है। ऊँची पहाड़ी से नारा शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

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अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में विश्वभर के हिन्दी विद्वान आये थे। विशेषता यह थी कि जापान में हिन्दी विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह है। वे हिन्दी और उर्दू के विद्वान माने जाते हैं। भारतीय हिन्दी साहित्य के अच्छे ज्ञाता माने जाते हैं। सम्मेलन में कई पुस्तकों का लोकार्पण हुआ और जाने-माने कई विद्वानों को सम्मानित किया गया। जापानियों का हिन्दी प्रेम देखते ही बनता था। सम्मेलन विश्वबंधुत्व का परिचायक था। जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार होने से प्रायः वहाँ की सभ्यता, संस्कृति भारतीय संस्कृति से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। स्वभाषा-प्रेम तथा स्वदेश-भक्ति की सीख जापानियों से लेनी चाहिए।

यात्रा जापान की Summary in Kannadaयात्रा जापान की Summary in Kannada 1
यात्रा जापान की Summary in Kannada 2
यात्रा जापान की Summary in Kannada 3
यात्रा जापान की Summary in Kannada 4
यात्रा जापान की Summary in Kannada 5
यात्रा जापान की Summary in Kannada 6
यात्रा जापान की Summary in Kannada 7
यात्रा जापान की Summary in Kannada 8

यात्रा जापान की Summary in English

This travelogue, by Mamta Kalia, is a description of the author’s trip to Japan, to attend an International Hindi conference in Tokyo University.

In Tokyo, there is an Indian restaurant named ‘Calcutta’. The walls of this restaurant are decorated with Indian art forms and symbols. First, one is served hot water to drink. The word for drinking’ in Japanese, is ‘mizu’. Maintaining decorum and being polite is very important in Japanese culture. In the train stations of Japan, everything has to be done in the blink of an eye. Japanese passengers do not engage in jostling or moving disorderly. Unlike in India, in Japan, there are no seats reserved for either woman, old people, or the physically challenged.

The delegation visited the library of TUFS (Tokyo University of Foreign Language Studies). This is a four-storey building and on every storey, there is a reading hall. The library had 6,18,615 books. These books could be accessed from cupboards by pressing an electrically operated button. When the button was pressed again, the cupboard would close automatically. This arrangement not only saved space but also protected the books. There was sufficient space to stand in front of the cupboards. An alarm would be heard as soon as one came out of the library. The object of this alarm was to ascertain that no book was carried away by the visitor. The members of the Indian delegation saw many rare books in the Indological section.

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The New Trunk Line in Japan is also referred to as the Bullet train. This train can run at speeds up to 170 kilometres per hour. The train has 16 compartments and can hold 1300 passengers. There are 66 tunnels between Tokyo and Osaka through which this train passes.

In Japanese, a fort is called ‘Jo’, while a temple is called ‘ji’. In 1585, Emperor Toyotomi Hideyoshi constructed the fort at Osaka. The fort is surrounded by steep cliffs and a deep moat on all sides. At the entrance, there is a huge door. This fort is a testament to the struggles of the Japanese.

There is a renowned temple located in Nara, called Todai-Ji, which was built in 743 A.D. The temple is dedicated to Gautama Buddha (Daibutsu). There is a 55 feet tall bronze idol of Buddha. Dark and brown wood has been used to build it. There is a deer park attached to Todai-Ji. The path that leads from the temple to the deer forest is full of beautiful sights of pristine nature. From atop tall mountains, one can look at the town of Nara.

The International Hindi Conference was attended by Hindi scholars from the world over. What was special was that in Japan there is a very big congregation of Hindi scholars who are well versed with Indian Hindi literature.

In the conference, many books were released to the public, and many well-known scholars were bestowed with honours. One can know the Japanese love for Hindi if one attends the conference. The conference is a precursor for universal brotherhood. Since most of Japan follows Buddhism, the customs and traditions of Japan seem to resemble Indian customs and traditions. We must learn how to love our mother tongue and how to be patriotic from the Japanese.

कठिन शब्दार्थ :

  • यदा-कदा – कभी-कभी;
  • तकनीकी – Technology;
  • कर्मठ – कर्मनिष्ठ;
  • पथ-प्रदर्शक – रास्ता दिखानेवाला;
  • धरातल – धरती;
  • धकापेल – धक्कम-धक्का;
  • शुमार – गणना;
  • बहुतायत – अधिकता;
  • जिज्ञासा – जानने की इच्छा;
  • जमावड़ा – भीड़;
  • फक्कड – लापरवाह एवं निश्चिंत व्यक्ति;
  • औघड़ – मनमौजी;
  • अदद – संख्या;
  • फिसल पट्टी – स्वचालित सीढ़ियाँ, Elevator;
  • पलक झपकना – बहुत थोड़े ही समय में।

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मुहावरा :
मक्खी मारना – बेकार बैठना।

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