2nd PUC Hindi Workbook Answers अपठित गद्यांश

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Karnataka 2nd PUC Hindi Workbook Answers अपठित गद्यांश

निम्नलिखित अनुच्छेद पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

1) “राजा राममोहन राय बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली थे। उनके पिता ने उनकी पढाई का समुचित प्रबंध किया। गाँव की पाठशाला में उन्होंने बँगला सीखी। उन दिनों कचहरियों में फारसी का बोलबाला था। अतः उन्होंने घर पर ही मौलवी से फारसी पढ़ी। नौ वर्ष की उम्र में वे अरबी की उच्च शिक्षा के लिए पटना भेजे गए। वहाँ वे तीन वर्ष तक रहे। उन्होंने कुरान का मूल अरबी में अध्ययन किया। बारह वर्ष की उम्र में वे काशी गए। चार वर्ष तक वहाँ उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया। इस बीच उन्होंने भारतीय दर्शन का भी अध्ययन किया।”

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प्रश्नः
i) राजा राममोहन राय की पढ़ाई की व्यवस्था किसने की?
ii) राजा राममोहन राय ने बँगला कहाँ सीखी?
iii) उन्होंने अरबी की शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
iv) बारह वर्ष की उम्र में वे कहाँ गए?
v) उन्होंने कितने वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन किया?
उत्तरः
i) राजा राममोहन राय की पढ़ाई की व्यवस्था उनके पिता ने की।
ii) राजा राममोहन राय ने गाँव की पाठशाला में बँगला सीखी।
iii) उन्होंने अरबी की शिक्षा पटना से प्राप्त की।
iv) बारह वर्ष की उम्र में वे काशी गए।
v) उन्होंने चार वर्षों तक संस्कृत का अध्ययन किया।

2) “साहित्योन्नति के साधनों में पुस्तकालयों का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इनके द्वारा साहित्य के जीवन की रक्षा, पुष्टि और अभिवृद्धि होती है। पुस्तकालय सभ्यता के इतिहास का जीता-जागता गवाह हैं। इसी के बल पर वर्तमान भारत को अपने अतीत गौरव पर गर्व है। पुस्तकालय भारत के लिए कोई नई वस्तु नहीं है। लिपि के आविष्कार से आज तक लोग निरन्तर पुस्तकों का संग्रह करते रहे हैं। पहले देवालय और विद्यालय इन संग्रहों के प्रमुख स्थान होते थे। इनके अतिरिक्त विद्वज्जनों के अपने निजी पुस्तकालय भी होते थे। मुद्रणकला के आविष्कार से पूर्व पुस्तकों का संग्रह करना आजकल की तरह सरल बात न थी। आजकल साधारण स्थिति के पुस्तकालय में जितनी सम्पत्ति लगती है, उतनी कभी-कभी एक-एक पुस्तक की तैयारी में लग जाया करती थी। भारत के पुस्तकालय संसार-भर में अपनी सानी नहीं रखते थे। प्राचीन काल से मुगल सम्राटों के समय तक यही स्थिति रही। चीन, फारस प्रभृति सुदूरस्थित देशों से झुण्ड के झुण्ड विद्यानुरागी लम्बी यात्राएँ करके भारत आया करते थे।”

प्रश्नः
i) साहित्योन्नति के साधनों में किसका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है?
ii) पुस्तकालय किसका जीता-जागता गवाह है?
ii) पहले पुस्तकालय किन-किन स्थानों पर हुआ करते थे?
iv) पुराने समय में पुस्तकों पर अधिक व्यय क्यों होता था?
v) पुस्तकालयों के कारण भारत को क्या गौरव प्राप्त था?
उत्तरः
i) साहित्योन्नति के साधनों में पुस्तकालयों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ii) पुस्तकालय सभ्यता का जीता-जागता गवाह है।
iii) पहले पुस्तकालय देवालय और विद्यालयों में हुआ करते थे।
iv) मुद्रणयंत्र न होने के कारण पुराने समय में पुस्तकों पर अधिक व्यय होता था।
v) पुस्तकालयों के कारण भारत को अपने अतीत गौरव पर गर्व है।

अतिरिक्त प्रश्न :

3) सुन्दर प्रतिभा, मनभावनी चाल और स्वच्छन्द प्रकृति ये ही दो-चार बातें देखकर मित्रता की जाती है। पर जीवन-संग्राम में साथ देने वाले मित्रों में इनसे कुछ अधिक बातें होनी चाहिए। मित्र केवल उसे नहीं कहते, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिसे हम स्नेह न कर सकें। जिससे हम अपने छोटे काम को तो निकालते जाएँ, पर भीतर ही भीतर घृणा करते रहें। मित्र सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें। भाई के समान होना चाहिए, जिसे हम अपना प्रीतिपात्र बना सकें। हमारे और मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए, ऐसी सहानुभूति जिससे दोनों मित्र एक दूसरे की बराबर खोय-खबरलें। ऐसी सहानुभूति, जिससे एक के हानि-लाभ को दूसरा अपना हानि-लाभ समझे। मित्रता के लिए आवश्यक नहीं है कि दो मित्र एक ही प्रकार का कार्य करते हों या एक ही रुचि के हों। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में भी बराबर की प्रीति और मित्रता देखी जाती है।

प्रश्न:
i) किन बातों को देखकर मित्रता की जाती है?
ii) मित्र किसे नहीं कहना चाहिए?
iii) सच्चा मित्र कैसा होता है?
iv) मित्र के प्रति क्या होनी चाहिए?
v) मित्रता के लिए क्या आवश्यक नहीं है?
उत्तर:
i) सुन्दर प्रतिभा, मनभावनी चाल और स्वच्छन्द प्रकृति ये ही दो-चार बातें देखकरमित्रता की जाती है।
ii) मित्र केवल उसे नहीं कहते, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिसे हम स्नेह न कर सकें।
iii) सच्चा मित्र पथ-प्रदर्शक के समान होता है, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें।
iv) मित्र के प्रति सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए।
v) मित्रता के लिए आवश्यक नहीं है कि दो मित्र एक ही प्रकार का कार्य करते हों या एक ही रूचि के हों।

4) भारत विश्व सभ्यता का जनक है, क्योंकि इसकी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। प्रलय के बाद सर्वप्रथम भारत भूमि पर ही मनु द्वारा सृष्टि की रचना हुई। धरती का स्वर्ग तथा अनेक ऋषि-मुनियों, देवताओं और महापुरुषों की पुण्य भूमि भारत पर स्वयं भगवान राम और कृष्ण ने अवतार लेकर इसकी मिट्टी को तिलक करने योग्य बना दिया। दुनिया की अनेक संस्कृतियाँ मिट गई परंतु भारत की संस्कृति आज भी जीवित है। अपने ऐश्वर्य और समृद्धि के कारण यह ‘सोने की चिड़िया’ कहलाया। सभी प्रकार की कलाओं और विद्याओं का शुभारंभ इसी धरती पर हुआ। तथा मोक्ष का मूलमंत्र भी सर्व प्रथम इसी धरती के लोगों के हाथ लगा जिसे संपूर्ण विश्व में फैलाकर भारत ‘विश्वगुरु’ कहलाया। आज भारत ने हर क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। इसलिए हम गर्व से कहेंगे ‘मेरा भारत महान है’।

प्रश्न:
i) भारत को किसका जनक कहा जाता है?
ii) प्रलय के बाद किसकी रचना हो गई?
iii) धरती को स्वर्ग और मिट्टी को तिलक के योग्य किस-किसने बनाया?
iv) किसके कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है?
v) किसका शुभारंभ भारत भूमि पर हुआ है?
उत्तरः
i) भारत को विश्व सभ्यता का जनक कहा जाता है।
ii) प्रलय के बाद सृष्टि की रचना हुई।
iii) स्वयं भगवान राम और कृष्ण ने अवतार लेकर धरती को स्वर्ग और मिट्टी को तिलक के योग्य बनाया।
iv) अपने ऐश्वर्य और समृद्धि के कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है।
v) सभी प्रकार की कलाओं और विद्याओं का शुभारंभ इसी भारत भूमि पर हुआ है।

5) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परम्परा है। यह आयोजन पिछले कई बरसों से संकटमोचन मंदिर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है व हनुमान जयंती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्त्रीय एवं उप-शास्त्रीय गायन-वादन की उत्कृष्ट सभा होती है। इसमें बिस्मिल्ला खाँ अवश्य रहते थे। अपने मजहब के प्रति अत्यधिक समर्पित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार थी। वे जब भी काशी से बाहर रहते तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला धुमा दिया जाता और भीतर की आस्था रीड़ के माध्यम से बजती थी। खाँ साहब की एक रीड 15 से 20 मिनट के अंदर गीली हो जाती थी, तब वे दूसरी रीड का इस्तेमाल कर लिया करते थे।

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प्रश्नः
i) काशी की प्राचीन एवं अद्भुत परम्परा क्या है?
ii) संकटमोचन मंदिर कहाँ पर स्थित है?
iii) बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा किसके प्रति अपार थी?
iv) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ किस वाद्य को बजाते थे?
v) खाँ साहब की एक रीड कितने समय में गीली हो जाती थी?
उत्तरः
i) संगीत आयोजन काशी की प्राचीन एवं अद्भुत परम्परा है।
ii) संकटमोचन मंदिर काशी शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है।
iii) बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति अपार थी।
iv) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ शहनाई वाद्य को बजाते थे।
v) खाँ साहब की एक रीड 15 से 20 मिनट के अंदर गीली हो जाती थी।

6) मित्रता अनमोल धन है। इसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। हीरे-मोती या सोने-चाँदी से भी नहीं। मैत्री की महिमा बहुत बड़ी है। सच्चा मित्र सुख और दुख में समान भाव से मैत्री निभाता है। जो केवल सुख में साथ होता है, उसे सच्चा मित्र नहीं कहा जा सकता। साथ-साथ खाना-पीना, सैर, पिकनिक का आनंद लेना सच्ची मित्रता का लक्षण नहीं। सच्ची मित्रता की बस एक पहचान है और वह है – विचारों की एकता। विचारों की एकता ही इसे दिनोंदिन प्रगाढ़ करती है। सच्चा मित्र बड़ा महत्वपूर्ण होता है। जहाँ चाह न लगे, वही बाँह बढ़ाकर उबार लेता है। मित्रता करना तो आसान है, लेकिन निभाना बहुत ही मुश्किल। आज मित्रता का दुरुपयोग होने लगा है। लोग अपने सीमित स्वार्थों की पूर्ति के लिए मित्रता का ढोंग रचते हैं। मित्रता जीवन का सर्वश्रेष्ठ अनुभव है। यह एक ऐसा मोती है, जिसे गहरे सागर में डूबकर ही पाया जा सकता है। मित्रता की कीमत केवल मित्रता ही है। सच्ची मित्रता जीवन का वरदान है। सच्चा मित्र मनुष्य की सोई किस्मत को जगा ‘सकता है और भटके को सही राह दिखा सकता है।

प्रश्नः
i) कौन सुख और दुख में समान भाव से मैत्री निभाता है?
ii) मित्रता की क्या पहचान है?।
iii) क्या मित्रता निभाना आसान है?
iv) मित्रता की प्राप्ति किस प्रकार हो सकती है?
v) सच्चा मित्र किसको सही राह दिखा सकता है?
उत्तरः
i) सच्चा मित्र सुख और दुख में समान भाव से मैत्री निभाता है।
ii) विचारों की एकता ही मित्रता की सही पहचान है।
iii) मित्रता निभाना बहुत मुश्किल है।
iv) मित्रता एक ऐसा मोती है, जिसे गहरे सागर में डूबकर ही पाया जा सकता है।
v) सच्चा मित्र भटके को सही राह दिखा सकता है।

7) संसार का प्रत्येक धर्म दया और करुणा का पाठ पढ़ाता है। हर धर्म सिखाता है कि जीव पर दया-भाव रखो और कष्ट में फँसे इंसान की सहायता करो। परोपकार की भावना ही सबसे बड़ी मनुष्यता है। परोपकार की भावना रखने वाला न तो अपने-पराए का भेदभाव रखता है और न ही अपनी हानि की परवाह करता है। दयावान किसी को कष्ट में देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकता। उसकी आत्मा उसे दुखी प्राणी के लिए कुछ करने को मजबूर करती है। अगर कोई किसी पर अत्याचार करे या बेकसूर को यातना दे, तो हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम बेकसूर का सहारा बनें। न्याय व धर्म की रक्षा करना सदा से धर्म है। दया-भाव विहीन मनुष्य भी पशु समान ही होता है। जो दूसरों की रक्षा करते हैं, वे इस सृष्टि को चलाने में भगवान की सहायता करते हैं। धर्म का मर्म ही दया है। दया-भाव से ही धर्म का दीपक सदा प्रज्वलित रहता है।

प्रश्नः
i) संसार का हर धर्म किसका पाठ पढ़ाता है?
ii) सबसे बड़ी मनुष्यता क्या है?
iii) दयावान व्यक्ति कब चुपचाप नहीं बैठ सकता?
iv) न्याय व धर्म की रक्षा करना क्या है?
v) सृष्टि को चलाने में भगवान की सहायता कौन करते हैं?
उत्तरः
i) संसार का हर धर्म दया और करूणा का पाठ पढ़ाता है।
ii) परोपकार की भावना ही सबसे बड़ी मनुष्यता है।
iii) दयावान व्यक्ति किसी को कष्ट में देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकता।
iv) न्याय व धर्म की रक्षा करना हमारा धर्म और कर्तव्य है।
v) सृष्टि को चलाने में भगवान की सहायता वही करते है जो दूसरों की रक्षा करते हैं।

8) मदर तेरेसा द्वारा किए जा रहे सेवा-कार्यों को समस्त विश्व में प्रतिष्ठा मिली है। उन्हें सम्मानसूचक तथा आर्थिक सहयोग के रूप में जो धन मिलता था, उसे वे सामाजिक सेवा कार्यों के उपयोग में लाती थीं। अधिकतर धनराशी, झुग्गी-झोंपड़ियों के निवासियों के लिए पाठशाला खोलने पर व्यय की जाती थी। अप्रैल 1962 में तत्कालीन राष्ट्रपति जी ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया था। इसके तत्पश्चात् फिलीपिंस सरकार की ओर से उन्हें 10,000 डालर का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस धनराशि से उन्होंने आगरा में कुष्ठाश्रम बनवाया, जहाँ कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा की जाती है। सन् 1964 में जब पोप भारत आए थे, तो उन्होंने अपनी कार मदर तेरेसा को भेंट कर दी थी। मदर तेरेसा ने वह कार 59,930 डालर में नीलाम कर दी थी तथा उस धनराशि से कुष्ठ रोगियों की एक बस्ती बसाई, ताकि ऐसे लोगों की चिकित्सा और सही देखभाल की जा सके।

प्रश्नः
i) मदर तेरेसा के सेवा-कार्यों को कहाँ प्रतिष्ठा मिली है?
ii) अधिकतर धनराशि मदर तेरेसा द्वारा कैसे व्यय की जाती थी?
iii) उन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि से कब अलंकृत किया गया था?
iv) फिलीपिंस सरकार से प्राप्त धनराशि से उन्होंने कहाँ कुष्ठाश्रम बनवाया?
v) किसने अपनी कार मदर तेरेसा को भेंट दी?।
उत्तरः
i) मदर तेरेसा के सेवा-कार्यों को समस्त विश्व में प्रतिष्ठा मिली है।
ii) अधिकतर धनराशि मदर तेरेसा द्वारा झुग्गी-झोंपड़ियों के निवासियों के लिए पाठशाला खोलने पर व्यय की जाती थी।
iii) अप्रैल 1962 में उन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि से अलंकृत किया गया था।
iv) फिलीपिंस सरकार से प्राप्त धनराशि से उन्होंने आगरा में कुष्ठाश्रम बनवाया।
v) पोप ने अपनी कार मदर तेरेसा को भेंट दी।

9) यह कहावत सत्य है कि समय बलवान है, इस पर किसी का वश नहीं चलता। आनेवाले समय में अच्छा-बुरा क्या घट जाए, कोई नहीं जानता। ऐसे अनिश्चित समय के लिए यदि उसके पास कुछ संचित धन है तो उसके काम आ सकता है। कोई भी व्यक्ति दूसरों के सहारे न तो कल रह सका है, न आज रह पा रहा है, न ही भविष्य में रह सकता है। यह कटु सत्य है। मनुष्य का आज का जीवन कई प्रकार की आकस्मिकताओं वाला बन चुका है। अतः उन आकस्मिकताओं का ठीक प्रकार से सामना करने के लिए, प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह प्रतिदिन जितनी भी हो अधिक-से-अधिक बचत करता रहे। इसी में उसकी भलाई है। आज की गई एक-एक पैसे की बचत कल का अनंत सुख सिद्ध हो सकती हैं। धन की कमी से सुखपूर्वक तो क्या सामान्य जीवन भी जी पाना कतई संभव नहीं है। मनुष्य के जीवन में हमेशा से धन की आवश्यकता बनी रही है। उसे पूरा करने के लिए बचत करना नितांत आवश्यक है। अतः व्यक्ति अपने सभी तरह के स्रोतों से आज और कल में संतुलन बनाए रखकर ही सुख-चैन से जीवन जी सकता है।

प्रश्न:
i) कौन सी कहावत सत्य है?
ii) कटु सत्य क्या है?
iii) मनुष्य की भलाई किस में है?
iv) धन की कमी से क्या संभव नहीं है?
v) व्यक्ति सुख-चैन से कब जी सकता है?
उत्तर:
i) समय बलवान है, इस पर किसी का वश नहीं चलता।
ii) कटु सत्य यह है कि कोई भी व्यक्ति दूसरों के सहारे न तो कल रह सका है, न आज रह पा रहा है, न ही भविष्य में रह सकता है।
iii) मनुष्य की भलाई इस में है कि वह प्रतिदिन जितनी भी हो अधिक-से-अधिक बचत करता रहे।
iv) धन की कमी से सुखपूर्वक तो क्या सामान्य जीवन भी जी पाना संभव नहीं है।
v) व्यक्ति अपने सभी तरह के स्रोतों से आज और कल में संतुलन बनाए रखकर ही सुख-चैन से जीवन जी सकता है।

10) धर्म को लोगों ने धोखे की दुकान बना रखा है। वे उसकी आड़ में स्वार्थ सिद्ध करते हैं। बात यह है कि लोग धर्म को छोड़कर सम्प्रदाय के जाल में फँस रहे हैं। सम्प्रदाय बाह्य कृत्यों पर जोर देते हैं। वे चिन्हों को अपनाकर धर्म के सार-तत्व को छोड़ देते हैं। धर्म मनुष्य को अंतर्मुखी बनाता है। उसके हृदय किवाड़ों को खोलता है, उसी आत्मा को विशाल, मन को उदार तथा चरित्र को उन्नत बनाता है। सम्प्रदाय संकीर्णता सिखाते हैं, जात-पांत, रूप-रंग तथा ऊँच-नीच के भेद भावों से ऊपर नहीं उठने देते।

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प्रश्नः
i) धर्म को लोगों ने किसकी दुकान बना रखी है?
ii) लोग धर्म को छोड़कर किसके जाल में फंस रहे हैं?
iii) लोग किनको अपनाकर धर्म के सार तत्व को छोड़ देते हैं?
iv) धर्म मनुष्य को क्या बनाता है?
v) सम्प्रदाय क्या सिखाता है?
उत्तरः
i) धर्म को लोगों ने धोखे की दुकान बना रखी है।
ii) लोग धर्म को छोड़कर सम्प्रदाय के जाल में फंस रहे हैं।
iii) लोग चिन्हों को अपनाकर धर्म के सार-तत्व को छोड़ देते हैं।
iv) धर्म मनुष्य को अंतर्मुखी बनाता है।
v) सम्प्रदाय संकीर्णता सिखाते हैं।

11) इस स्वतंत्र भारत देश के नागरिक होने का गर्व तभी सार्थक कर सकेंगे जब हम आपस की फूट और वैमनस्य से बचकर देश की समृद्धि, संपन्नता एवं सुरक्षा में प्राणपण से योग दें। देश की स्वतंत्रता के लिए हमें अपनी अबाधिक स्वतंत्रता पर नियंत्रण करना होगा। स्वतंत्र देश के नागरिक की भाँति इस अनुशासन में रहना सीखें, हम अपने चुने हुए नेता का आदर करे, विपक्ष की बात सावधानी से सुनने को तैय्यार रहें और देश के हित को पार्टी, जाति, सम्प्रदाय और व्यक्तियों के हित की अपेक्षा अधिक महत्व दें।

प्रश्नः
i) हमें किस देश के नागरिक होने का गर्व है?
ii) हमें किससे बचकर देश की समृद्धि पर योगदान देना है?
iii) हमें किस पर नियंत्रण रखना होगा?
iv) स्वतंत्र देश के नागरिक होने के कारण हमें क्या-क्या करना होगा?
v) स्वतंत्र देश के नागरिकों को किस पर अधिक महत्व देना होगा?
उत्तरः
i) हमें स्वतंत्र भारत देश के नागरिक होने का गर्व है।
ii) हमें आपस की फूट और वैमनस्य से बचकर देश की समृद्धि पर योगदान देना है।
iii) हमें अपनी अबाधित स्वतंत्रता पर नियंत्रण करना होगा।
iv) हमें अनुशासन में रहना, चुने हुए नेता का आदर करने एवं विपक्ष की बात सावधानी से सुनने को तैयार रहना होगा।
v) स्वतंत्र देश के नागरिकों को पार्टी, जाति, संप्रदाय हित से आगे देशहित को रखना होगा।

12) संसार के सभी नेताओं ने अपनी प्रतिज्ञा में देश की भलाई के लिए निष्ठा से सेवा करने के सिद्धांतों की सत्यता पर विश्वास करके अपने कदम को आगे बढ़ाया है। अनुयायियों के विश्वासघात के भय से उन्होंने पलायन नहीं किया न आतताइयों के भय से उन्होंने उनके सामने सर झुकाया। मेरे जीवन की अपेक्षा मेरी मृत्यु से ही सत्य का अधिक कल्याण होगा – यह कहते हुए महात्मा ईसा सूली पर चढ़ गये और महान दार्शनिक सुकरात मुस्कुराते हुए जहर का प्याला पी गये। इतिहास साक्षी है कि महात्मा ईसा के साथ उनका धर्म सूली पर नहीं चढ़ाया जा सका और न ही सुकरात के साथ उनके शाश्वत सिद्धांतों का अंत हुआ।

प्रश्न:
i) संसार के सभी नेताओं ने कैसे अपने कदम को आगे बढ़ाया है?
ii) नेताओं ने किसके विश्वासघात के भय से पलायन नहीं किया?
ii) नेताओं ने किसके सामने अपना सर नहीं झुकाया?
iv) ‘मेरे जीवन की अपेक्षा मेरी मृत्यु से ही सत्य का अधिक कल्याण होगा’ इसे किस महात्मा ने कहा?
v) किसके शाश्वत सिद्धांतों का अंत न हुआ?
उत्तर:
i) संसार के सभी नेताओं ने देश की भलाई के लिए निष्ठा से सेवा करने के सिद्धांत की सत्यता पर विश्वास करके अपने कदम को आगे बढ़ाया है।
ii) नेताओं ने अनुयायियों के विश्वासघात के भय से पलायन नहीं किया।
iii) नेताओं ने आतताइयों के भय से उसके सामने अपना सर नहीं झुकाया।
iv) ‘मेरे जीवन की अपेक्षा मेरी मृत्यु से ही सत्य का अधिक कल्याण होगा’ इसे महात्मा ईसा ने कहा।
v) सुकरात के शाश्वत सिद्धांतों का अंत नहीं हुआ।

13) मनुष्य सुखाभिलाषी प्राणी है। सुख व आनंद प्राप्त करने के लिए वह कर्म करता है। यद्यपि इस कार्य में परिश्रम और कष्ट तो करना पड़ता है, तो भी परिणति आनंद में होती है। मनुष्य धन कमाता है, उससे जरूरत की चीजों के अतिरिक्त ऐश्वर्य और विलास की वस्तुयें खरीदता हैं। किसलिए? आनंद पाने के लिए। आनंद के बिना मानव का जीवन शून्य है। किसी काम को करने का आनंद तभी मिलता है जब वह स्वेच्छा से किया गया हो। एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण की कभी नीरस होने नहीं देता। मानव के स्वभाव का असर दूसरे व्यक्तियों पर पड़ें बिना नहीं रहता।

प्रश्नः
i) मनुष्य कैसा प्राणी है?
ii) मनुष्य कर्म किसलिए करता है?
iii) मनुष्य धन क्यों कमाता है?
iv) आनंद के बिना मनुष्य का जीवन कैसा है?
v) एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति किसे नीरस होने नहीं देता?
उत्तरः
i) मनुष्य सुखाभिलाषी प्राणी है।
ii) मनुष्य सुख और आनंद प्राप्त करने के लिए कर्म करता है।
iii) मनुष्य धन, ऐश्वर्य और विलास की वस्तुयें खरीदता है।
iv) आनंद के बिना मनुष्य का जीवन शून्य है।
v) एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण को नीरस होने नहीं देता।

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14) हमारे देश में प्राचीन काल से अच्छे स्वास्थ्य के लिए उचित आहार पर जोर दिया गया है। चिकित्सा शास्त्र के आचार्यों और ऋषि-मुनियों ने आयुर्वेद में आहार की महत्ता प्रतिपादित की है। उपनिषद् में कहा गया है – अन्न ही हमारे मन का निर्माण करता है। चरक संहिता में लिखा है – अन्न प्राणियों का प्राण है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार भोजन अथवा आहार यथायोग्य होना चाहिए। हमारा आयुर्वेद तो भोजन अथवा आहार संबंधी हिदायतों से भरा पड़ा हैं। लेकिन फिर भी यह विडम्बना ही है कि भारत में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण से किसी न किसी रूप में ग्रस्त हैं तथा एक-तिहाई के लगभग महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। आयुर्वेद में पथ्य एवं कुपथ्य को भी बहुत अधिक महत्व दिया गया हैं। आयुर्वेद में शरीर और मन के लिए हितकारी आहार को पथ्य एवं शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले भोज्य पदार्थों को कुपथ्य कहा गया है।

प्रश्नः
i) हमारे देश में प्राचीन काल से अच्छे स्वास्थ्य के लिए किस पर जोर दिया गया है?
ii) उपनिषद् में क्या कहा गया हैं?
iii) श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आहार किस प्रकार का होना चाहिए?
iv) भारत में आधे से अधिक बच्चे किससे व्यस्त हैं?
v) शरीर और मन के लिए हितकारी आहार को क्या कहते हैं?
उत्तरः
i) हमारे देश में प्राचीन काल से अच्छे स्वास्थ्य के लिए उचित आहार पर जोर दिया गया है।
ii) उपनिषद् में कहा गया है कि अन्न ही हमारे मन का निर्माण करता है।
iii) श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आहार यथायोग्य होना चाहिए।
iv) भारत में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण से ग्रसित है।
v) शरीर और मन के लिए हितकारी आहार को पथ्य कहा गया है।